
Mohit Maurya
लोक नीति एवं समसामयिक विषयों के लेखक
अगस्त 2019 में अनुच्छेद 370 को निरस्त करना भारत के समकालीन शासन का एक महत्वपूर्ण संवैधानिक बदलाव था। इस निर्णय ने जम्मू-कश्मीर के प्रशासनिक और कानूनी ढांचे को पूरी तरह बदलकर उसे देश के बाकी हिस्सों के साथ एकीकृत संवैधानिक व्यवस्था में शामिल कर दिया। दशकों तक अनुच्छेद 370 ने राज्य को एक विशेष प्रशासनिक दर्जा दिया था। इसके समर्थक इसे क्षेत्रीय पहचान की रक्षा मानते थे, जबकि आलोचकों का मानना था कि इससे राष्ट्रीय कानूनों, कल्याणकारी योजनाओं और सामाजिक सुरक्षा उपायों के समान कार्यान्वयन में बाधा आती थी। 2019 के बदलावों का उद्देश्य इन्हीं कमियों को दूर कर भारतीय संविधान और केंद्रीय कानूनों को जम्मू-कश्मीर पर पूरी तरह लागू करना था।
अनुच्छेद 370 के बाद जम्मू-कश्मीर के शासन ढांचे में सामाजिक न्याय और समान अधिकारों का विस्तार सबसे महत्वपूर्ण बदलावों में से एक रहा है। केंद्रीय कानूनों के लागू होने से उन समुदायों की सुरक्षा मजबूत हुई है जो पहले सीमित कानूनी ढांचे के कारण पीछे रह जाते थे, और आरक्षण, कल्याणकारी लाभ व कानूनी सुरक्षा उपायों को राष्ट्रीय मानकों के अनुरूप लाने से शिक्षा, रोजगार और सामाजिक विकास के अवसरों तक पहुंच व्यापक हुई है। इन सुधारों का महिलाओं पर भी बड़ा असर पड़ा है, क्योंकि पहले विरासत और संपत्ति के अधिकारों में जो सीमाएं थीं उन्हें हटाकर कानून के समक्ष समानता के सिद्धांत को मजबूत किया गया है, जिससे नागरिकता और सामाजिक सुरक्षा पूरे क्षेत्र में समान रूप से लागू हो सके। इसके साथ ही 2019 के बाद जमीनी स्तर पर लोकतंत्र को भी बढ़ावा मिला है। पंचायती राज संस्थाओं के विस्तार से ग्राम और जिला स्तर पर निर्वाचित प्रतिनिधियों की भूमिका बढ़ी है, और स्थानीय निकाय अब कल्याणकारी योजनाओं को लागू करने तथा स्थानीय जरूरतों के आधार पर विकास को दिशा देने के मुख्य केंद्र बन गए हैं, जिससे शासन समुदायों के करीब आया है और जनभागीदारी व जवाबदेही को प्रोत्साहन मिला है।
2019 के बाद जम्मू-कश्मीर के प्रशासनिक ढांचे के पुनर्गठन से दक्षता, पारदर्शिता और संस्थागत जवाबदेही पर विशेष जोर दिया गया है। केंद्र शासित प्रदेश मॉडल अपनाने से निर्णय प्रक्रिया सुव्यवस्थित हुई, विभागों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित हुआ और राष्ट्रीय शासन प्रणालियों के साथ घनिष्ठ सामंजस्य बना। साथ ही डिजिटल शासन में बड़ा बदलाव आया है। ऑनलाइन सेवाओं, डिजिटल दस्तावेजीकरण और तकनीक आधारित सार्वजनिक वितरण तंत्रों के विस्तार से प्रशासनिक अड़चनें कम हुई हैं। अब नागरिक डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए कल्याणकारी लाभ, प्रमाण-पत्र और अन्य सरकारी सेवाएं आसानी से प्राप्त कर पा रहे हैं, जिससे कामों में देरी घटी है और प्रशासन में पारदर्शिता बढ़ी है।
इसी अवधि में जम्मू-कश्मीर का राष्ट्रीय कल्याण कार्यक्रमों और विकास पहलों के साथ एकीकरण भी गहरा हुआ है। केंद्रीय योजनाओं के विस्तार से स्वास्थ्य, आवास, वित्तीय समावेशन, शिक्षा, ग्रामीण विकास और सामाजिक सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में व्यापक पहुंच संभव हुई है। इस एकीकरण का उद्देश्य एक समान कल्याणकारी वितरण प्रणाली बनाना है, जहां राष्ट्रीय तंत्रों के माध्यम से लाभ सीधे नागरिकों तक पहुंचें। बेहतर प्रशासनिक समन्वय और डिजिटल प्रणालियों ने अंतिम छोर तक सेवा वितरण को मजबूत किया है और यह सुनिश्चित किया है कि योजनाएं लक्षित लाभार्थियों तक प्रभावी ढंग से पहुंचें। अब शासन का फोकस नागरिक-केंद्रित हो गया है, जहां सरकारी सेवाओं का आकलन उनकी सुलभता, दक्षता और प्रभाव के आधार पर किया जाता है।
2019 के बाद के ढांचे का उद्देश्य कानूनी और प्रशासनिक सुधारों के साथ-साथ जम्मू-कश्मीर में एक अनुकूल आर्थिक वातावरण बनाना भी रहा है। राष्ट्रीय आर्थिक प्रणालियों के साथ एकीकरण को बढ़ाकर उद्यमशीलता, निवेश और निजी क्षेत्र की भागीदारी को प्रोत्साहित किया गया है, वहीं प्रशासनिक बाधाओं को कम करने पर भी जोर दिया गया है। इस दौरान ऐसी संस्थाओं और नीतियों पर ध्यान दिया गया है जो यहां के युवाओं, व्यवसायों और उद्यमियों को भारत के व्यापक आर्थिक तंत्र का हिस्सा बनने में मदद करें। बेहतर शासन, डिजिटल विस्तार और नीतिगत सुधारों ने आर्थिक अवसरों और दीर्घकालिक विकास के लिए अनुकूल परिस्थितियां तैयार की हैं। इसके साथ ही एक स्थिर सुरक्षा वातावरण को प्रभावी शासन और विकास की बुनियाद माना गया है। 2019 के बाद संस्थाओं के सुचारू कामकाज, नागरिकों की बढ़ी हुई भागीदारी और आर्थिक गतिविधियों के विस्तार पर ध्यान केंद्रित किया गया, जिससे शासन प्रक्रियाओं और विकास पहलों के क्रियान्वयन में मदद मिली है।
अनुच्छेद 370 को निरस्त किए छह वर्ष बाद जम्मू-कश्मीर के शासन परिदृश्य में बड़े संस्थागत बदलाव देखे गए हैं। इसके परिणामस्वरूप संवैधानिक एकीकरण बढ़ा है, राष्ट्रीय कानूनों का व्यापक रूप से अनुप्रयोग हुआ है, जमीनी स्तर पर शासन मजबूत हुआ है और सामाजिक न्याय व कल्याणकारी योजनाओं तक पहुंच का विस्तार हुआ है। इस बदलाव का आकलन केवल राजनीतिक बहसों से नहीं, बल्कि शासन संरचनाओं में आए परिवर्तन और नागरिकों के अधिकारों व अवसरों तक पहुंच में हुए सुधारों से भी किया जा सकता है। यह प्रयास एक समान कानूनी सुरक्षा, मजबूत संस्थानों और नागरिक-प्रशासन के बीच प्रत्यक्ष भागीदारी वाले ढांचे को स्थापित करने का है। अंततः किसी भी शासन मॉडल की सफलता इस बात से तय होती है कि वह नागरिकों को कितना सशक्त बनाता है, सेवाएं कितनी प्रभावी ढंग से देता है और समान अवसर कितने सृजित करता है। संवैधानिक बदलावों के छह वर्ष बाद, जम्मू-कश्मीर की शासन यात्रा संस्थागत एकीकरण, प्रशासनिक सुधार और नागरिक-केंद्रित शासन की दिशा में एक व्यापक प्रयास को दर्शाती है।